(चार)

गरम - गरम भात माड़ के संग, साध में बथुआ का साग परोसती हुई पूछ बैठी सुरसतिया - “का जी ! आज बहुत जल्दी गए मुर्दाघर से ...... का बात हए ...... कवनो लाश नहीं पहुंची थी का ?”

पहुंची थी, लेकिन ........

लेकिन का ?”

गये हरी भजन को, ओटन लगे कपास ......

मतलब ?”

मतलब कि गये मुर्दाघर आउर मिल गई नौकरी

नई नौकरी, का कह रहे हएं आप ?”

हां सुरसतिया, बिल्ली के भाग से छिंका टूट गया आज

बिल्ली ..... छिंका ...... देखो हमका पहेली मत बुझाओ साफ - साफ बताओ का हुआ आज ?”

आज गजबे हो गया सुरसतिया, अब कवनो हमका बड़ा आदमी बने से नाहीं रोक सकत ....कहते -कहते खुशी से चिहुंकने लगा झींगना आयी हुई हिचकी को शान्त करने के लिए पानी का ग्लास उठाया और लगा लिया होठों से

सुरसतिया को लगा कि वह मजाक कर रहा है उसकी पुरानी आदत जो ठहरी ख्याली पुलाव पकाने की सो वह गमछा बढ़ाती हुई बोली-

हई लो गमछा, पोछ लो मुंह, थोड़ी देर लेट जाओ, फिर करना आगे की बतकही

मगर बुलबुले फूट रहे थे झींगना के पेट में वह कहां शान्त बैठने वाला था, बोला-‘‘नाही सुरसतिया ! सुन लो अच्छी खबर हए

ठीक है, बताई दो, पेट में मत रखो कोई बात मुस्कुरीती हुई बोल पड़ी सुरसतिया

झींगना पालथी मारकर जमीन पर बैठा और सुनाने लगा आज की अपनी राम कहानी -

जानती हो सुरसतिया, आज एगो लाश आयी पोस्टमार्टम खातिर बहुत बड़े कलाकार की लाश, नामी लोक कलाकार अक्लु बैठा सीतामढ़ी के वियाह पंचमी मेला में कार्यक्रम पेश करने आया था वह अभी - अभी सोनपुर के हरिहर क्षेत्र मेला में तहलका मचा के आया था हो ........

बीच में टोकती हुई बोली सुरसतिया - “ एह में खुशी के कवन समाचार हए जी ! मार खुशी के फूले नहीं समा रहे थे

झींगना झुंझलाया -
बीच में काहे टोकती हो ?”

ठीक हए सुनाओं बोली सुरसतिया

हां तो सुनो का हुआ .......बेचारा चमन लाल जे नाटक मंडली का सर्वे सर्वा हए, रो रहा था बेचारा उसकी चिंता थी, कि अब कइसे चलेगा उसका नाटक। उसे सुनने दूर - दराज से आते थे लोग, खुब चलता था उसका नाटक। अक्लू बैठा जान था उसकी नाटक मण्डली का नाटक को लेके बड़ा परेशान था बेचारा अपना धनेसर नाही हए चमरौटी के असेसर का भाई ऊहे बात में चमन लाल से कहा, कि -
हमरे गांव मा भी एगो कलाकार हए, बड़हन कलाकार चालिस कोस में उसका डंका बजता हए अजमाके देख लो, हमार दावा हए गैदरिंग हो जाएगा मेला में --

कवन ?”

अरे इहे हमार झींगना मैया

पहले तो नाक - भौं सिकोड़ा, लेकिन मजबूरी थी, कॉण्ट्रेक्ट जो हो गया था मेला का, नुकसान हो जाता, सो दे दिया हमको मौका, बोला -
रिश्क ले रहे हएं धनेसर हम तुम्हरे गारंटी पर खाली काल्हे के प्रो्रेगाम खातिर चल गया पइसा भी कमाएगा आउर नाम भी नहीं चला अपने घर, हम अपने घर, बोलो मंजूर ?”

धनेसरा ने आव देखा ताव हां कर दिया झठ से हमको का मिल गयी विन मांगी मुराद आखिर मुदाघर की नौकरी में रखा का हए नाम पइसा नहीं चले तो फिर आएंगे वापस हमरा का जाएगा, हमरे दोनों हांथों में लडडू हए लडडू उपरवाले ने सुन ली हमारी, वर्षों का अरमान पूरा हुआ। आउर अवसर बार - बार थोड़े आता हए सो हमने झटके से अपनी हामी भर दी ठीक किया सुरसतिया ?”

जल्दबाजी में हां करने की का जरूरत थी , सोच बिचारके फैसला करते सुरसतिया बोली

झींगना को यह अंच्छा लगा, मुंह विचकाते हुए बोला विचारके फैसला करते ?”

सुरसतिया को झींगना की भावनाएं आहत होने का भान हुआ सो वह उसके फैसले को उचित ठहराती हुई बोली-
जौन काम माम लागे उहे काम करऽ।

.......क्रमश: ......

3 टिप्पणियाँ:

  1. अंश पढ़कर सम्‍पूर्ण उपन्‍यास को पढने की जिज्ञासा उत्‍पन्‍न हो रही है।

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  2. हमरे गांव मा भी एगो कलाकार हए, बड़हन कलाकार चालिस कोस में उसका डंका बजता हए । अजमाके देख लो, हमार दावा हए गैदरिंग हो जाएगा मेला में -- ।”
    ...deshaj shabdon kee baangi dekhte hi banti hai....boli ka anupamp prayog... kuch hatkar padhne ko mila bahut achha laga...aabhar

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  3. देखते हैं झींगना क्या जवाब देता है नौकरी बदलने का। रोचक उप्न्यास
    आभार।

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